केंद्र सावरकर के बजाए शिवकुमार स्वामीजी को भारत रत्न दे – सिद्धारमैया

बेंगलुरु, कर्नाटक के पूर्व मुख्यमंत्री सिद्धारमैया ने कहा कि केंद्र सावरकर के बजाए लिंगायत संत शिवकुमार स्वामीजी को भारत रत्न दे।

बता दें कि स्वामी जी का इसी साल जनवरी में 111 साल की आयु में निधन हो गया था। स्वामीजी को चलते-फिरते भगवान की संज्ञा दी गई थी। उनके व्यक्तित्व और कार्यों को दुनिया भर में प्रसिद्धि प्राप्त है। वह ख्याति प्राप्त शिक्षक और मानवतावादी भी थे।

सावरकर को भारत रत्न के बारे में पूछने पर सिद्धारमैया ने मैसूर में कहा कि भाजपा का जो भी सोच हो लेकिन मेरा मानना है कि सावरकर के बजाय शिवकुमार स्वामीजी को भारत रत्न दिया जाना चाहिए। उन्होंने कुछ दिन पहले ही सावरकर को महात्मा गांधी की हत्या का आरोपी बताया था।

महाराष्ट्र भाजपा ने अपने चुनावी घोषणापत्र में वीर सावरकर को मरणोपरांत भारत रत्न देने का वादा किया है। जिसके बाद इस मुद्दे पर देशव्यापी बहस जारी है।

सिद्धारमैया ने कहा कि सावरकर के प्रति उनका विरोध मुख्यतः इसलिए है क्योंकि उन्होंने हिंदुत्व के जरिए सांप्रदायिकता फैलाई। सिद्धारमैया ने कहा कि भाजपा कड़ी प्रतिक्रिया दे रही है क्योंकि उन्होंने सच बोला है।

1883 में मुंबई (तत्कालीन बॉम्बे) में जन्मे वीर सावरकर भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के क्रांतिकारी थे। इसके साथ ही वह एक राजनेता, वकील, लेखक और हिंदुत्व दर्शनशास्त्र के प्रतिपादक थे। मुस्लिम लीग के जवाब में उन्होंने हिंदु महासभा से जुड़कर हिंदुत्व का प्रचार किया था।

वर्ष 2000 में वाजपेयी सरकार ने तत्कालीन राष्ट्पति केआर नारायणन के पास सावरकर को भारत का सर्वोच्च नागरिक सम्मान ‘भारत रत्न’ देने का प्रस्ताव भेजा था। लेकिन उन्होंने उसे स्वीकार नहीं किया था।

साल 1948 में महात्मा गांधी की हत्या के छठे दिन विनायक दामोदर सावरकर को गांधी की हत्या के षड्यंत्र में शामिल होने के लिए मुंबई से गिरफ्तार कर लिया गया था। हांलाकि उन्हें फरवरी 1949 में बरी कर दिया गया था।

अपने राजनीतिक विचारों के लिए सावरकर को पुणे के फरग्यूसन कॉलेज से निष्कासित कर दिया गया था। साल 1910 में उन्हें नासिक के कलेक्टर जैकसन की हत्या में संलिप्त होने के आरोप में लंदन में गिरफ्तार कर लिया गया था।

सावरकर ने एक पुस्तक लिखी ‘हिंदुत्व – हू इज हिंदू?’ (Hindutva – Who is Hindu) जिसमें उन्होंने पहली बार हिंदुत्व को एक राजनीतिक विचारधारा के तौर पर इस्तेमाल किया।

1966 में अपनी मृत्यु के कई दशकों बाद भी भारतीय राजनीति में वीर सावरकर एक ‘पोलराइजिंग फिगर’ हैं। या तो वे आपके हीरो हैं या विलेन।

सावरकर कभी राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और भारतीय जनसंघ के सदस्य नहीं रहे। लेकिन संघ परिवार में उनका नाम बहुत इज्जत व सम्मान के साथ लिया जाता है।

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