याचना नहीं अब रण होगा, संघर्ष बड़ा भीषण होगा – उपेंद्र कुशवाहा

मोतिहारी, राष्ट्रीय लोक समता पार्टी के अध्यक्ष और केंद्रीय मंत्री उपेंद्र कुशवाहा ने मोतिहारी अधिवेशन के बाद पत्रकारों से बात करते हुए राज्य सरकार पर तो खूब हमले किए लेकिन एनडीए में रहने या अलग होने पर तस्वीर साफ नहीं की। कुशवाहा ने ऐसा कोई एलान नहीं किया, जिसकी राजनीति गलियारों में उम्मीद की जा रही थी। कहा जा रहा है कि एनडीए में रहने या बाहर जाने पर अंतिम फैसला अब कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी से मुलाकात के बाद लिया जा सकता है। 10 दिसंबर को राहुल गांधी से उपेंद्र कुशवाहा की मुलाकात हो सकती है। इस मुलाकात के बाद ही वे केंद्रीय मंत्रिपरिषद से इस्तीफा भी दे सकते हैं। वैसे इस मसले पर उपेंद्र कुशवाहा ने बस इतना कहा कि मैं किससे मिलूं यह कोई और तय नहीं कर सकता है। किसी से भी मिलने के लिए मुझे किसी से मंजूरी लेने की जरूरत नहीं है।

रालोसपा प्रमुख उपेंद्र कुशवाहा ने बिहार के मोतिहारी में एक जनसभा को संबोधित करते हुए प्रदेश सरकार और भाजपा पर जमकर हमला बोला है। हालांकि कुशवाहा ने यह साफ नहीं किया है कि वह 2019 लोकसभा चुनाव एनडीए के साथ मिलकर चुनाव लड़ने पर सस्पेंस बरकरार है। इस जनसभा में कुशवाहा ने कहा कि याचना नहीं अब रण, संघर्ष बड़ा भीषण होगा।

उन्होंने कहा कि यह लड़ाई आरपार की होगी। रालोसपा ने प्रदेश सरकार के खिलाफ रण की घोषणा की है और बीजेपी की प्रदेश ईकाई की आलोचना की है।

उन्होंने कहा कि सीट शेयरिंग को लेकर पहले भाजपा राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह से मिलने की कोशिश की गई लेकिन वह नहीं मिले। इसके बाद हमने फैसला किया कि अब प्रधानमंत्री से मिलेंगे और उनसे मिलने के लिए समय मांगा गया लेकिन चार से पांच दिन बीत गए लेकिन कोई बात नहीं बनी। इसके बाद हमें बर्बाद और तोड़ने की कोशिश की गई। लालच देकर हमारे विधायकों को अपने पास बुलाने की काशिश की गई और इसके लिए सत्ता के हथियार का इस्तेमाल किया गया।

उपेंद्र कुशवाहा ने जनसभा में मुख्यमंत्री नीतीश कुमार पर जमकर निशाना साधा। कुशवाहा ने कहा कि हर मामले में राज्य सरकार फेल है और अब बिहार में सुशासन नहीं है।

उन्होंने कहा कि 15 साल यहां एक ही सरकार है और अब बिहार में बदलाव की जरूरत है। इसलिए हम बिहार की निकम्मी सरकार है उसको उखाड़कर फेंकने का काम करेंगे। मैंने सोचा था कि दिल्ली में बैठे हुए लोग सोचेंगे लेकिन उन्होंने निराश किया और बीजेपी की बिहार ईकाई ने नीतीश के आगे नतमस्तक हो गई है।

लोकसभा का चुनाव है हमें चर्चा करनी चाहिए गरीबी दूर की, बेरोजगारी दूरी की इस लिए चुनाव से पहले मंदिर का मुद्दा उठाया है। मंदिर बनाना था तो उसका दूसरा तरीका था और रालोसपा मंदिर या मजिस्द के खिलाफ नहीं है। मंदिर बनाना राजनीतिक दल का काम नहीं है।

इस इस जनतंत्र की ताकत है कि चाय बेचने वाला भी बैठ सकता है और अखबार बेचकर अपने परिवार का जीवनयापन करता है वह राष्ट्रपित बन सकता है। लेकिन दलित का बच्चा हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में जज नहीं बन सकता है।

सूत्रों की माने तो उपेंद्र कुशवाहा अब शरद यादव की पार्टी के साथ विलय करके कांग्रेस के साथ नए सिरे से गठबंधन पर बात करने की कोशिश में हैं। वैसे कुशवाहा का हर दांव खाली जा रहा है, ऐसे में राहुल से मुलाकात के बाद भी कोई नतीजा निकलेगा यह देखने वाली बात है।

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