बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने राज्यपाल को सौंपा अपना इस्तीफा

पटना,        बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने राज्यपाल फागू चौहान को अपना इस्तीफा सौंप दिया हैं। साथ ही उन्होंने 160 विधायकों के समर्थन के साथ नई सरकार बनाने का दावा भी पेश किया। शाम करीब 4 बजे नीतीश, राज्यपाल फागू चौहान से मिलने पहुंचे और अपना इस्तीफा सौंप दिया। नीतीश कुमार महागठबंधन के साथ फिर बिहार में नई सरकार बनाने जा रहे हैं। बिहार के राज्यपाल को अपना इस्तीफा सौंपने के बाद जद (यू) नेता नीतीश कुमार ने कहा कि हमारे सभी सांसदों और विधायकों के बीच इस बात पर आम सहमति पर है कि हमें एनडीए छोड़ देना चाहिए। राजभवन से बाहर आते हुए मीडियाकर्मियों से नीतीश कुमार ने कहा कि वो अब एनडीए गठबंधन से बाहर आ चुके हैं। उन्होंने कहा कि पार्टी के सभी सांसद और विधायक चाहते थे कि एनडीए गठबंधन छोड़ दिया जाए। ये फैसला पार्टी का है।उन्होंने ये भी बताया कि अब आरजेडी के साथ नई सरकार बनाएंगे। इस दौरान नीतीश कुमार ने बताया कि राज्यपाल ने उनका इस्तीफा स्वीकार कर लिया है। नीतीश कुमार से जब मीडिया ने पूछा कि बीजेपी से क्या दिक्कत हुई तो उन्होंने कहा कि बहुत सी चीजें हुई हैं जिसे हमारे लोग बता देंगे।बिहार में पिछले तीन दिनों से जारी राजनीतिक उठापटक का दौर आखिर दौर में पहुंच गया।

इससे पहले जेडीयू की बैठक में मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने कहा कि भारतीय जनता पार्टी ने हमेशा अपमानित करने का काम किया है। जेडीयू को षडयंत्र के तहत खत्म करने की कोशिश की गई।जेडीयू की आज हुई बैठक में पार्टी के सभी विधायकों और सांसदों ने सीएम नीतीश कुमार के फैसले का समर्थन किया और कहा कि वे उनके साथ हैं। उन्होंने कहा कि वे हमेशा उनके साथ रहेंगे, जो कुछ भी वह तय करेंगे।

राजभवन से एनडीए गठबंधन छोड़ने के बाद नीतीश कुमार तेजस्वी यादव से मिलने राबड़ी आवास पहुंचे हैं। यहां उनका भव्य स्वागत किया गया। यहां वे आगे की रणनीति पर तेजस्वी यादव संग चर्चा कर रहे हैं। राजभवन पहुंचकर सीएम पद से इस्तीफा देने के बाद अकसर आरजेडी के शासनकाल को जंगलराज बताने वाले नीतीश कुमार जब तेजस्वी यादव से मिलने राबड़ी देवी के आवास पहुंचे तो उनका अंदाज राजद के प्रति काफी नरम दिखा। यही नहीं आरजेडी के साथ मिलकर आगे बढ़ने की बातें भी कीं। उन्होंने राबड़ी देवी के आवास पर कहा कि आइए नई शुरुआत करते हैं। जो कुछ हुआ, उसे भूलकर हमें आगे बढ़ना है। बिहार के लिए काम करना है। यही नहीं 2017 में आरजेडी से गठबंधन तोड़ने को लेकर नीतीश कुमार ने अफसोस भी जताया।

तेजस्वी यादव उनसे उम्र में छोटे हैं और प्रशासनिक अनुभव भी कम है। इसके अलावा लालू यादव सीन से बाहर हैं। ऐसी स्थिति में नीतीश कुमार को लगता है कि वह तेजस्वी यादव से आसानी से डील कर लेंगे। उन्हें लगता है कि आरजेडी का जनाधार और अपनी छवि के सहारे वह आसानी से इस कार्यकाल को पूरा कर पाएंगे। यही वजह है कि नीतीश कुमार ने 5 साल से कम के अंतर में ही पालाबदल लिया है।

मीडिया रिपोर्ट्स हैं कि नीतीश कुमार और राजद नेता तेजस्वी यादव प्रेस कांफ्रेंस करेंगे। दोनों इस बात की घोषणा करेंगे कि शपथ ग्रहण कब होने वाला है। नई सरकार में आगे की रणनीति को लेकर नीतीश और तेजस्वी महागठबंधन के नेताओं को भी संबोधित करेंगे। नीतीश कुमार ने भाजपा का साथ छोड़कर करीब 5 साल बाद एक बार फिर से पलटी मारी है। अब वह उसी राजद के साथ सरकार बनाने जा रहे हैं, जिसकी सत्ता के दौर को वह कभी जंगलराज बताते नहीं थकते थे। लेकिन अब नीतीश कुमार ने भाजपा का साथ उसी आरजेडी के लिए छोड़ा है।

बिहार में भाजपा अध्यक्ष संजय जायसवाल ने कहा कि भाजपा बिहार के जनता के हितों को सोचती है। नीतीश कुमार की पार्टी ने कम सीट जीतीं। लेकिन पीएम मोदी के कहने पर हमने उन्हें सीएम बनाया। लेकिन जनता के साथ उन्होंने धोखा किया। बिहार की जनता कभी उन्हें माफ नहीं करेगी। 

बिहार में जारी सियासी हलचल और विभिन्न दलों के महत्वपूर्ण बैठक के बीच नई सरकार की तैयारी लगभग कर ली गई है। जेडीयू और महागठबंधन की बैठक के बाद तय हो गया हैं कि अब जेडीयू और महागठबंधन की सरकार बनेगी यानि राजग से अब नीतीश कुमार की जेडीयू ने अलग होने का निर्णय कर लिया हैं। नीतीश कुमार सीएम की कुर्सी पर भी अपनी शर्तों पर बने रहना चाहते हैं, चाहे सहयोगी कोई रहे। नीतीश कुमार आठवीं बार बिहार के सीएम बनने जा रहे हैं। नीतीश कुमार को बिहार में कभी पूर्ण बहुमत नहीं मिला, लिहाजा उन्हें समझौते की ही सरकार बनानी पड़ी। सात बार मुख्यमंत्री रह चुके नीतीश कुमार ने 6 बार भाजपा के समर्थन से और एक बार राजद समर्थन से सरकार बनाई।नीतीश कुमार के आवास पर जेडीयू विधायक दलों की बैठक में बीजेपी से अलग होने का फैसला ले लिया गया है। विधायक दल की बैठक में फैसला लिया गया है कि जेडीयू अब बीजेपी के साथ नहीं रह सकती।  बैठक के बाद नीतीश कुमार, राबड़ी देवी के आवास पर उनसे मिलने पहुंचे, जहां पर कांग्रेस और वाममोर्चा के नेता भी मौजूद थे। 

हिंदुस्तानी आवाम मोर्चा के अध्यक्ष जीतन राम मांझी ने कहा है कि बिहार में जो भी राजनीतिक परिस्थिति बने, वे हर हाल में नीतीश कुमार के साथ हैं।

जदयू नेता उपेंद्र कुशवाहा ने ट्वीट करते हुए लिखा कि नये स्वरूप में नये गठबंधन के नेतृत्व की जवाबदेही के लिए श्री नीतीश कुमार जी को बधाई। नीतीश जी आगे बढ़िए। देश आपका इंतजार कर कर रहा है। इस ट्वीट  से लग रहा है कि नीतीश कुमार देश की राजनीति के लिए अग्रसर होंगे।

केंद्रीय मंत्री गिरिराज सिंह ने कहा कि हमने हमेशा गठबंधन के धर्म का पालन किया है और गठबंधन की गरिमा को बनाए रखा है। उन्होंने कहा कि जब हमारे पास 63 विधायक थे और उनके पास 36 थे, तब भी हमने उन्हें मुख्यमंत्री बनाया। आज नीतीश खरीदारी करते दिख रहे हैं। गिरिराज सिंह ने राज्य में भाजपा के साथ गठबंधन तोड़ने के लिए जद (यू) प्रमुख की आलोचना करते हुए आरोप लगाया कि प्रधानमंत्री बनने की नीतीश की आकांक्षाओं ने उन्हें गठबंधन तोड़ने के लिए मजबूर किया। गिरिराज सिंह ने कहा कि पलटूराम आ गए पलट के।

केंद्रीय मंत्री अश्विनी चौबे ने कहा कि नीतीश कुमार अहम और वहम के शिकार हैं। अश्विनी चौबे ने कहा कि हमने छोटी पार्टी होने पर भी नीतीश कुमार को सिर पर बिठाया, लेकिन आसमान की ओर थूकने वाले के ऊपर ही गिरता है। उन्होंने कहा कि अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार से लेकर नरेंद्र मोदी सरकार तक बीजेपी का लक्ष्य बिहार का विकास ही रहा है।

चिराग पासवान ने कहा कि नीतीश कुमार ने दूसरी बार जनाधार का अपमान किया है। भाजपा ने हमेशा उनकी बात मानी। इससे बढ़कर और बात क्या होगी कि राज्य की तीसरे नंबर की पार्टी के नेता को सीएम बनाया गया।इसके बाद भी नीतीश कुमार ने पलटी मार दी। मैंने तो पहले ही कहा था कि नीतीश कुमार कभी भी पलटी मार सकते हैं। भाजपा ने उनकी हर बात मानी लेकिन अपनी व्यक्तिगत महत्वकांक्षाओं के चलते नीतीश कुमार यह फैसला ले रहे हैं। चिराग पासवान ने कहा कि आज नीतीश कुमार की क्रेडिबिलिटी शून्य है। हम चाहते हैं कि बिहार में राष्ट्रपति शासन लागू हो और राज्य को नए सिरे से जनादेश देना चाहिए। आपकी (नीतीश कुमार) कोई विचारधारा है या नहीं? अगले चुनाव में जदयू को शून्य सीटें मिलेंगी।

भ्रष्टाचार का आरोप लगने के बाद पिछले दिनों जेडीयू से इस्तीफा देने वाले आरसीपी सिंह ने भी ट्वीट कर बिना नीतीश कुमार या जेडीयू का नाम लिए कहा कि बिहार की जनता द्वारा एनडीए के पक्ष में दिए गए 2020 के जनादेश के साथ विश्वासघात!

चार दशकों के राजनीतिक करियर में, जद (यू) प्रमुख ने अपने कई सहयोगियों को बदला है। उन्होंने चार बार साझेदार बदले, जिससे उन्हें ‘पलटू राम’ का तमगा मिला। वैसे ये तमगा किसी और न नहीं बल्कि उनके पुराने व नए सहयोगी राजद सुप्रीमो लालू प्रसाद यादव ने दिया था।

बिहार विधानसभा में सीटों की कुल संख्या 243 है। यहां बहुमत साबित करने के लिए किसी भी पार्टी को 122 सीटों की जरूरत है। वर्तमान आंकड़ों को देखें तो बिहार में सबसे बड़ी पार्टी राजद है। उसके पास विधानसभा में 79 सदस्य हैं। वहीं, भाजपा के पास 77, जदयू के पास 45, कांग्रेस के पास 19, कम्यूनिस्ट पार्टी के पास 12, एआईएमआईएम के पास 01, हिंदुस्तानी आवाम मोर्चा के पास  04 सदस्य हैं। इसके अलावा अन्य विधायक हैं।

बिहार के सीएम नीतीश कुमार ने भाजपा के साथ गठबंधन तोड़ने का फैसला लिया है और एक बार फिर से वह आरजेडी, कांग्रेस और लेफ्ट दलों के साथ मिलकर सरकार बनाने की तैयारी में हैं। नीतीश कुमार ने यह फैसला अचानक ही लिया है, जिसने बिहार समेत देश भर के लोगों को चौंकाया है। लेकिन यह पहला मौका नहीं है, जब नीतीश कुमार ने इस तरह से अपना रुख बदला है। इससे पहले भी वह 2013 में एनडीए को छोड़कर आरजेडी और कांग्रेस के साथ चले गए थे। फिर 2017 में एक बार फिर से भाजपा के साथ चले आए थे। इस तरह वह राजनीति में कई बार पाला बदल चुके हैं। नीतीश कुमार ने कई बार राजनीतिक पंडितों को अब अपने पैंतरों से चौंकाया है। 2005 में भाजपा संग बिहार की सरकार बनाने वाले नीतीश कुमार ने पहली बार 2012 में चौंकाया था। वह एनडीए में थे, लेकिन राष्ट्रपति चुनाव में प्रणब मुखर्जी को वोट दिया था। इसके बाद 2013 में जब भाजपा ने नरेंद्र मोदी को पीएम कैंडिडेट घोषित किया तो नीतीश कुमार ने 17 साल पुराने रिश्ते को ही खत्म कर दिया था। जेडीयू ने उसके बाद 2014 का आम चुनाव आरजेडी के साथ ही मिलकर लड़ा था, लेकिन भाजपा की लहर में करारी हार हुई। तब नीतीश कुमार ने चौंकाते हुए सीएम पद से ही इस्तीफा दे दिया था और फिर जीतन राम मांझी सीएम बने थे। जेडीयू को बिहार की 40 लोकसभा सीटों में से महज 2 पर ही जीत मिली थी। इसके बाद नीतीश कुमार ने 2015 के विधानसभा चुनाव में महागठबंधन संग उतरने का फैसला लिया था और जीत भी हासिल की थी। यही नहीं जून 2017 में जब वह महागठबंधन के साथ तो राष्ट्रपति चुनाव में यूपीए की मीरा कुमार की बजाय एनडीए के रामनाथ कोविंद को वोट दिया था।इसके एक महीने बाद ही जुलाई में उन्होंने महागठबंधन छोड़ दिया था और एक बार फिर से भाजपा के साथ ही सरकार बना ली। बीते 5 सालों से भाजपा और जेडीयू साथ चल रहे थे, लेकिन इसी साल अप्रैल में एक बार फिर से उन्होंने चौंका दिया था। नीतीश कुमार ने राबड़ी के घर आयोजित इफ्तार पार्टी में हिस्सा लिया था। 5 साल बाद हुई इस मुलाकात के बाद से ही कयास तेज हो गए थे, जिनका अंत अब होने वाला है। अब नीतीश कुमार ने एक बार फिर से चौंकाया है और वह एनडीए को छोड़कर कांग्रेस और आरजेडी संग सरकार बनाने जा रहे हैं।

राष्ट्रीय जनता दल के नेता तेजस्वी यादव ने कहा है कि जेडीयू, आरजेडी, कांग्रेस, हम और लेफ्ट महागठबंधन की नई सरकार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ही होंगे। तेजस्वी यादव ने कहा कि आरजेडी विधायक दल की बैठक में विधायकों की इच्छा थी कि मैं सीएम बनूं लेकिन बिहार की जनता का जनादेश बतौर मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को मिला था इसलिए हमने उन्हें अपना नेता माना है और वो नई सरकार के सीएम होंगे।

बिहार में एक बार फिर सियासी उलटफेर हो गया है और 20 साल से अधिक समय तक एक-दूसरे के विरोधी रहे नीतीश कुमार की जदयू और लालू प्रसाद यादव की राजद सात साल के भीतर दूसरी बार एक साथ सरकार चलाने आ रही है। सियासी घमासान के बीच जदयू और भाजपा का गठबंधन टूट गया है और अब नीतीश कुमार, तेजस्वी यादव के नेतृत्व में राजद के साथ मिलकर सरकार बनाने की तैयारी में जुट गए हैं। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, राज्य में भारतीय जनता पार्टी और जनता दल यूनाइटेड के बीच गठबंधन टूट गया है। खबर है कि मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के आवास पर हुई बैठक में यह फैसला लिया गया है। सूत्रों की मानें तो नीतीश कुमार और तेजस्वी यादव के बीच गठबंधन पर मुहर लग चुकी है और महागठबंधन की सरकार बनने खाका भी तैयार हो चुका है। महागठंबधन सरकार में नीतीश कुमार ही मुख्यमंत्री रहेंगे और तेजस्वी यादव उपमुख्यमंत्री रहेंगे।

राजद और जदयू के बीच गठबंधन ऐसे वक्त में हुआ है, जब राजद सुप्रीमो लालू प्रसाद यादव चारा घोटाला केस में जमानत पर जेल से बाहर हैं और दिल्ली एम्स में उनका इलाज चल रहा है। इससे पहले जब साल 2015 में राजद और जदयू के बीच गठबंधन हुआ था, तब भी लालू प्रसाद यादव जमानत पर जेल से बाहर थे। यह संयोग ही कहा जाएगा कि जदयू और राजद दो बार सरकार बनाने को साथ आए और दोनों बार लालू प्रसाद यादव जेल से बाहर ही थे। साल 2015 में तो महागठबंधन की सरकार बनाने का पूरा श्रेय लालू प्रसाद यादव की ही जाता है। नीतीश कुमार के साथ गठबंधन का फैसला पूरी तरह से लालू प्रसाद यादव का ही था।

साल 2015 में हुए विधानसभा चुनाव में भाजपा और जदयू के राह जुदा हो गए थे और 20 साल बाद दो धुर विरोधी लालू और नीतीश साथ आ गए थे। इस चुनाव में राजद-जदयू महागठबंधन ने 178 सीटें जीतीं थीं, जबकि भाजपा नीत एनडीए 58 पर सिमट गया था। राजद को 80, जदयू को 71, कांग्रेस को 27 और भाजपा को 53 सीटों जी‍त नसीब हुई थी। हालांकि, 17 महीने बाद ही महागठबंधन में दरार पड़ गई और नीतीश कुमार ने फिर से भाजपा के साथ मिलकर सरकार बना ली।

बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के साथ गठबंधन तोड़ने का फैसला कर लिया है। नीतीश कुमार राष्ट्रीय जनता दल (आरजेडी) के समर्थन से सरकार बनाने का दावा पेश करेंगे। तेजस्वी यादव ने समर्थन देने की सूचना नीतीश तक पहुंचा दी है। नई कैबिनेट में गृह मंत्रालय पर जिच बना हुआ है। सूत्रों के मुताबिक तेजस्वी यादव ने गृह मंत्रालय आरजेडी को देने की मांग की है। नीतीश कुमार 2005 से ही कार्मिक और गृह विभाग अपने पास रखते आए हैं। इसके अलावा सारी डील फाइनल है।

ताजा अपडेट के मुताबिक कांग्रेस-लेफ्ट ने तेजस्वी को अपने विधायकों का समर्थन पत्र सौंप दिया है। पटना में राबड़ी आवास में हुई महागठबंधन की बैठक में तेजस्वी तो ये समर्थन पत्र सौंपा गया है। दूसरा अपडेट ये है कि सरकार के गठन को लेकर नीतीश कुमार और तेजस्वी यादव के बीच भी बात हो गई है।

आज राबड़ी आवास पर चल रही विधायक दल की बैठक में नीतीश कुमार के नाम पर मुहर लग गई है।

इस बीच राजद खेमे से एक बड़ी खबर आ रही है। बताया जा रहा है कि तेजस्वी यादव ने राजद के सभी विधायकों से समर्थन पत्र पर साइन करवा लिया है। सूत्रों ने बताया है कि तेजस्वी यादव समर्थन पत्र नीतीश कुमार को सौंपेंगे। इस बीच खबर यह भी सामने आ रही है कि बीजेपी मंत्री गठबंधन टूटने से पहले इस्तीफा दे सकते हैं।

महागठबंधन के घटक दल यानी राजद कांग्रेस और वामदलों की महत्वपूर्ण बैठक राबड़ी देवी के आवास पर हुई। कांग्रेस ने अपने सभी 19 विधायकों के साथ राबड़ी आवास में बैठक में शामिल होने का फैसला लिया था और माले के भी सभी विधायक इस बैठक में मौजूद थे।महागठबंधन की बैठक में राष्ट्रीय जनता दल के राज्यसभा सांसद, विधायकों और एमलसी ने तेजस्वी यादव को फैसले लेने का पूरा अधिकार दे दिया है। उनका कहना है कि वे तेजस्वी के साथ हैं। साथ ही यह भी कहा जा रहा है कि कांग्रस और वाम दलों के नेताओं ने पहले ही तेजस्वी के साथ देने की बात कही है।

दरअसल, आरसीपी सिंह की बीजेपी के साथ नजदीकियां और उनका पार्टी से इस्‍तीफा देने के बाद सीएम नीतीश पर हमलावर होना जेडीयू को काफी नागवार लगा। इसके पहले पिछले दिनों पटना में बीजेपी ने अपने विभिन्‍न मोर्चों की संयुक्‍त कार्यकारिणी की बैठक कर 200 विधानसभा सीटों के लिए रूपरेखा तैयार की। यह भी जेडीयू को अच्‍छा नहीं लगा। जवाब में जेडीयू ने कहा कि उसकी तैयारी 243 सीटों के लिए है।

बिहार विधानसभा चुनाव के दौरान और नतीजों के तुरंत बाद से ही नीतीश कुमार कुछ खफा-खफा नज़र आने लगे थे लेकिन जिन दो वजहों ने बीजेपी-जेडीयू गठबंधन के लिए कैंसर का काम किया उनमें से एक हाल में बीजेपी द्वारा पटना में अपने विभिन्‍न मोर्चों की संयुक्‍त राष्‍ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक कर 200 विधानसभा सीटों के लिए रूपरेखा तैयार करना और दूसरी विधानसभा में स्‍पीकर विजय कुमार सिन्‍हा से नीतीश कुुुुमार की तीखी बहस होना है। इसके बाद आरसीपी सिंह प्रकरण ने आग में घी डालने का काम किया।

बिहार विधानसभा चुनाव 2020 में 43 सीटों पर सिमटी जदयू को मुख्यमंत्री पद देने के बाद भाजपा का जिस प्रकार का रवैया रहा, वह नीतीश कुमार को कभी रास नहीं आया। वर्ष 2005 से सत्ता सहयोगी (2013 से 2017 के काल को छोड़कर) भाजपा, नीतीश कुमार के सामने कभी इतनी मुखर नहीं रही। अब स्थिति बदली तो नीतीश के मन में बदलाव का ख्याल आने लगा। लेकिन, क्या राजद में सात साल पुरानी स्थिति बरकरार है? क्या भतीजा, चाचा के लिए सत्ता शीर्ष का त्याग करने को तैयार है? शायद, अबकी बार नहीं।

तेजस्वी यादव ने बिहार विधानसभा चुनाव अपने दम पर लड़ा। बिहार की राजनीति से लालू के प्रभाव को खत्म नहीं किया जा सकता है। लेकिन, तेजस्वी ने राजद में उनकी जगह पर खुद को फिट करना लोकसभा चुनाव 2019 से ही शुरू कर दिया था। बिहार चुनाव 2020 में तेजस्वी ने अपने दम पर 75 सीटों पर जीत दर्ज की और गठबंधन को 110 सीटों के आंकड़े तक ले गए। मतलब, 243 सदस्यीय विधानसभा में पूर्ण बहुमत के आंकड़े से महज 12 सीट पीछे रह गए। वहीं, एनडीए 125 सीटों तक पहुंच पाई। लेकिन, सीटों के गणित में नीतीश कुमार ऐसे पिछड़े कि कभी सत्ता की ड्राइविंग सीट पर बैठकर राष्ट्रीय पार्टी भाजपा को छोटे भाई की भूमिका देने वाले खुद उसी जगह पर आ गए। बिहार चुनाव के दौरान भाजपा के तमाम शीर्ष नेताओं, पीएम नरेंद्र मोदी, केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह से लेकर प्रदेश अध्यक्ष तक ने नीतीश कुमार के चेहरे पर चुनाव लड़ने की बात कही। परिणाम में कम सीटों के बाद भी सीएम बना दिया गया, लेकिन इस बार वे ड्राइविंग सीट पर नहीं रहे। यहीं से भाजपा-जदयू के बीच की खाई बननी शुरू हुई।

तेजस्वी यादव इस समय बिहार की सत्ता से बाहर हैं। एआईएमआईएम के 5 विधायकों को पार्टी में मिलाने और बिहार चुनाव में 75 सीटों पर जीत के बाद उनके विधायकों की संख्या 80 पहुंच गई थी। पिछले दिनों विधायक अनंत सिंह की सदस्यता खत्म होने के कारण यह संख्या 79 पर आ गई है। इसके बाद भी वे विधानसभा में सबसे बड़े दल के मुखिया हैं। उनके साथ कांग्रेस के 19, भाकपा माले के 11, माकपा के 3 और भाकपा के 2 विधायकों का समर्थन है। इस प्रकार उनके समर्थक विधायकों की कुल संख्या 114 तक पहुंचती है। यानी, बहुमत से 8 कम। ऐसे में तेजस्वी यादव के सामने नीतीश कुमार की शर्तों की मानने की कोई वजह नहीं है। राजद पहले ही संकेतों में कहती रही है कि तेजस्वी को प्रदेश की कमान मिले और नीतीश दिल्ली देखें। वहीं, नीतीश कुमार पटना छोड़ना नहीं चाहते। सीएम की कुर्सी पर भी अपनी शर्तों पर बने रहना चाहते हैं, चाहे सहयोगी कोई रहे।

तेजस्वी यादव अब नंबर दो की कुर्सी नहीं चाहते और मामला यहीं पर आकर अटका हुआ है। राजद और उनके सहयोगी दल भी भविष्य की सरकार में अपनी मजबूत दावेदारी चाहते हैं। मसलन, गृह विभाग से लेकर शिक्षा, पथ निर्माण, वित्त, वाणिज्य, उद्योग और श्रम संसाधन, ग्रामीण विकास और ग्रामीण कार्य विभाग तक पर राजद की ओर से दावेदारी है। इसमें से अधिकांश विभाग लंबे समय से जदयू के पाले में रहा है। मामला यहां भी फंसता दिख रहा है। अगर तेजस्वी अपनी रणनीति पर अड़े रहे तो जदयू को पाला बदलने से हासिल कुछ खास नहीं होगा।

जदयू का एक बड़ा खेमा राजद के साथ जाने के पक्ष में अभी नहीं दिख रहा है। कई नेताओं के बयान आ चुके हैं, जिसमें वे एनडीए की सरकार को खतरा नहीं बता रहे हैं। ऐसे में अगर नीतीश कुमार एक बार फिर पाला बदलने की कोशिश करते हैं तो असली खेल शुरू हो सकता है। भले ही आरसीपी सिंह ने पार्टी से इस्तीफा दे दिया हो, लेकिन संगठन में उनकी पकड़ मजबूत है। नीतीश कुमार के प्रभाव के कारण अभी पाले के विधायक खुलकर सामने नहीं आ रहे, लेकिन अंदरखाने में बगावत के बीज फूटने लगे हैं। अभी छोटे-छोटे स्तरों पर इस्तीफों का दौर शुरू हुआ है। भाजपा के पास अपने 77 विधायक हैं। सबसे बड़ा विधानसभा अध्यक्ष का पद उनके पास है, जिस पर विजय कुमार सिन्हा जैसे नेता बैठे हुए हैं। उनके पास आचार समिति की वो अनुशंसा है, जिस पर फैसला लेकर बाजी पलट सकते हैं।

बजट 2021 के दौरान 23 मार्च को बिहार विधानसभा में जमकर हंगामा हुआ था। मेज पर लगी माइकों को तोड़ा गया था। कुर्सियां चली थी। मार्शलों के साथ हाथापाई हुई थी। सदन के भीतर पुलिस घुसी थी और कई विधायकों के साथ मारपीट का मामला सामने आया था। इस मामले को विधानसभा अध्यक्ष ने आचार समिति को सौंपा था। समिति के अध्यक्ष राम नारायण मंडल और सदस्यों ज्ञानेंद्र सिंह ज्ञानू, अरुण कुमार सिन्हा, रामविशुन सिंह और अचमित ऋषिदेव ने पूरे मामले की जांच कर अपनी रिपोर्ट दी है। इसमें 17 विधायकों के खिलाफ कार्रवाई की अनुशंसा की गई है। ये विधायक राजद के हैं। अगर इनकी सदस्यता गई तो बिहार विधानसभा में राजद और सहयोगियों के सदस्यों की संख्या 97 रह जाएगी।

राजद और कांग्रेस के भी कई विधायक दोबारा नीतीश कुमार के नेतृत्व को स्वीकार करने को तैयार नहीं दिख रहे। ऐसे में भाजपा इन विक्षुब्धों को साधने की कोशिश कर सकती है। आरसीपी सिंह ने अगर कोई खेल किया तो बिहार में राजनीति अचानक से पलटने के भी आसार हैं। इन तमाम पहलुओं को नीतीश कुमार भी बारीकी से परख रहे हैं। 2015 में उन्होंने राजद के साथ मिलकर 17 महीने की सरकार चलाई थी। तब के हालातों को भी फिर से देखने की कोशिश हो रही है। भाजपा पर वे सीधा आरोप भी नहीं लगा सकते हैं, क्योंकि मामला उनके पार्टी के भीतर का है। महागठबंधन तोड़ने की वजह सरकार में उनकी पूछ का खत्म होना और राबड़ी आवास सत्ता का केंद्र बनना था। भाजपा ने उन्हें चुनाव में 43 सीटों पर जीत के बाद भी सीएम बनाया। ऐसे में वे कोई बड़ा आरोप नहीं लगा सकते। गठबंधन तोड़ने का एक विपरीत संदेश कार्यकर्ताओं तक जाने की भी आशंका है।

नीतीश कुमार की राजनीति का आधार वोट बैंक ओबीसी और महादलित रहे हैं। करीब 8 से 10 फीसदी वोट शेयर के साथ वे जिस खेमे में शिफ्ट होते हैं, सरकार उसकी बन जाती है। लेकिन, आरसीपी सिंह के खिलाफ नोटिस और उनके इस्तीफे ने नालंदा या यूं कहें तो दक्षिणी बिहार के ओबीसी वोट बैंक तक एक बड़ा संदेश दिया है। जदयू के प्रदेश अध्यक्ष ललन सिंह जिस भूमिहार जाति से आते हैं, उसने बिहार चुनाव में खुलकर नीतीश कुमार का विरोध किया था। कई स्थानों पर नोटा, कांग्रेस या लोजपा उम्मीदवार को वोट देने की खबर आई। ऐसे में उनके स्तर से आरसीपी पर जिस प्रकार का हमला किया गया है, उसका भी अगल संदेश जाता दिख रहा है। ऐसे में जदयू के विधायक दल की बैठक को चर्चा यह है कि नीतीश कुमार मन टटोलने की कोशिश करेंगे। वे जानने का प्रयास करेंगे कि आरसीपी सिंह पर कार्रवाई को लेकर उनकी क्या सोच है? विधायकों की राय के बाद ही नीतीश कुमार अगले कदम की तैयारी करेंगे।

 

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